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Reading: सावधानः मुहर्रम पर जुलूस निकाला तो दंगाई बना देंगे!
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BeyondHeadlines > Exclusive > सावधानः मुहर्रम पर जुलूस निकाला तो दंगाई बना देंगे!
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सावधानः मुहर्रम पर जुलूस निकाला तो दंगाई बना देंगे!

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published November 14, 2013 25 Views
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7 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

Contents
क्या बेतिया के ‘मोदीकरण’ से बिगड़ा है शहर का माहौल?‘मोदियापे’ में झुलसने से बच गया एक शहर‘They were Burning My City’

बेतिया : धार्मिक जुलूस उन्माद का कारण बनते रहे हैं. भारत में हुए अधिकतर सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि में भी धार्मिक जुलूस ही रहे हैं. शुक्रवार को भारत में मुहर्रम मनाया जाएगा. इस दिन मुहर्रम का जुलूस निकाला जाता है.

किसी भी तनाव से बचने के लिए बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया की पुलिस ने एक साहसिक शुरुआत करते हुए मुहर्रम के जुलूस के दौरान हथियारों के प्रदर्शन पर रोक लगाने का फ़ैसला लिया है. पुलिस ने जनहित में एक अपील भी जारी की है, जो पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गई है. हालाँकि लोग प्रशासन पर ही सांप्रदायिक होने का आरोप लगा रहे हैं.

लोगो का आरोप है कि प्रशासन सैंकड़ों वर्ष पुरानी परंपराओं को एक झटके में ही ख़त्म कर देना चाहता है. दरअसल, मुहर्रम के मौके पर बेतिया शहर में मुस्लिम समुदाय के लोग जुलूस निकालते हैं. इन जुलूसो को अखाड़ा कहा जाता है. प्रशासन ने इस बार मोहर्रम के दौरान अखाड़े निकालने पर रोक लगा दी है.

लेकिन मुस्लिम समुदाय इसके विरोध में तर्क दे रहा है कि यदि पुलिस साम्प्रदायिक नहीं है तो महावीरी अखाड़े को रोकने के लिए ऐसी अपील क्यों नहीं की गई थी.

हाल ही में महावीरी अखाड़े के दौरान पूरी छिटपूट हिंसा हुई थी और असामाजिक तत्वों ने दुकानों, मकानों और गाड़ियों को नुकसान भी पहुँचाया था. महावीरी अखाड़े के दौरान मुस्लिम समाज से जुड़े स्थानों जैसे कि कब्रिस्तानों आदि पर हमले भी किए गए थे. यही नहीं प्रशासन की छूट के कारण दिन में भी अखाड़ा निकाला गया. शहर का माहौल ख़राब करने की कोशिशें सुर्खियाँ भी बनी थी.

मुहर्रम के मौक़े पर बेतिया पुलिस द्वारा जारी अपील में कहा गया है कि-

bettiah police apeall to citizensयदि आप किसी साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वाली घटना में शामिल होंगे तो आपके ऊपर भा.द.वि. की धारा 152, 153(A), 153(B), 188, 295(A), 296. 298 के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाएगी.

-आप दंगाई घोषित किए जाएंगे और ज़िन्दगी भर इस दाग के साथ जिएंगे.

– आप किसी नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर पाएंगे.

–  अगर आप जन प्रतिनिधी हैं तो भविष्य में कोई चुनाव नहीं लड़ पाएंगे.

–  ख़ुफ़िया विभाग की आपके ऊपर हमेशा नज़र रहेगी.

–  थाना और न्यायालय के चक्कर में आप और आपका पूरा परिवार परेशान रहेगा.

– आपके घर कोई रिश्ता नहीं जोड़ना चाहेगा.

इसके साथ-साथ यह भी लिखा है कि दिनांक 14-15 नवम्बर, 2013 को मोहर्रम है. इस अवसर पर जुलूस निकाले जाते हैं, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से गुज़रते हुए प्रदर्शनकारी परम्परागत हथियारों का प्रदर्शन करते रहे हैं. इस हथियार प्रदर्शन में लुकार, ज्वलनशील पदार्थ, घातक हथियार जो आर्म्स एक्ट के अन्तर्गत निषेधित है, उन्हें जुलूस में शामिल करना  प्रशासन द्वारा पूर्ण प्रतिबंधित किया गया है.

वहीं शहर में इस बात की भी चर्चा ज़ोरों पर है कि रात में अखाड़े या जुलूस निकालने पर प्रतिबंध है. बजाब्ता तौर पर मस्जिदों में इस बात का ऐलान भी किया गया है कि रात में आखाड़ा न निकालें. यहीं नहीं, प्रशासन की ओर से हर चौक-चौराहे पर पुलिस बल तैनात किया गया है. साथ ही पूरे शहर व आस-पास के इलाक़े में पुलिस गश्त भी कर रही है. जिससे लोगों में दहशत का माहौल है, और त्योहार का रंग पूरी तरह से फीका पड़ गया है.

इस सिलसिले में जब BeyondHeadlines ने एक अधिकारी से संपर्क किया तो उन्होंने नाम न प्रकाशित किए जाने के शर्त पर बताया कि पुलिस का यह क़दम गलत है. वो शांति का अपील बिल्कुल कर सकती है, लेकिन लोगों को इस तरह से डरा कर शांति की अपील नहीं की जानी चाहिए. साथ ही उन्हें इस अपील के साथ पुरानी महावीरी अखाड़े वाले घटना का ज़िक्र भी करना चाहिए.

इस सिलसिले में हमने शहर के पुराने व बुजुर्ग लोगों से भी बात की तो उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि प्रशासन को ऐसा नहीं करना चाहिए था. खुद ही मुस्लिम समुदाय के लोग शांति बहाली के कोशिशों में लगातार लगे हुए हैं. किसी को डराकर शांति बहाल की कोशिश नहीं की जा सकती. कुछ लोगों का कहना है कि बेतिया पुलिस को अपने इस कारनामें पर माफी मांगनी चाहिए.

स्पष्ट रहे कि मोहर्रम के अखाड़ा की तरह शहर में हिन्दू भी नागपंचमी के दिन महीवीरी आखाड़ा निकालते हैं. यह अखाड़ा पिछले 12 अगस्त, 2013 को निकाला गया था, जिसमें मोदीकरण के नाम पर सांप्रदायिक तनाव फैलाकर शहर का माहौल खराब करने की कोशिश की गई थी.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि धार्मिक जुलूसों से माहौल ख़राब होने का इतिहास रहा है. पुलिस ने मोहर्रम के जुलूस के दौरान हथियारों के प्रदर्शन पर रोक लगाने का साहसिक फ़ैसला लिया है. लेकिन जो भाषा पुलिस ने की है वह डराने-धमकाने की ज़्यादा है और इससे लोगों में ग़लत संदेश भी जा रहा है.

यदि पुलिस ने थोड़ा सही भाषा का इस्तेमाल किया होता तो इस अपील को सकारात्मक रूप में भी लिया जा सकता था. अभी तक लोगों की जो प्रतिक्रियाएं हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि पुलिस की धमकी भरी अपील से तनाव और बढ़ गया है.

साथ ही इस तर्क में भी दम है कि जो पुलिस नागपंचमी के दौरान निकले महावीरी अखाड़े के दौरान हुए तांडव पर ख़ामोश रही थी वह मुहर्रम पर धमकाऊ भाषा में अपील कैसे कर सकती है?

पूरे मामले पर बस यही कहा जा सकता है कि पुलिस के नेक़ मक़सद पर बचकानी भाषा ने पानी फेर दिया है.

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